तंत्र हूं मैं

   
पीठ पर चिपके अवांछित
लोक के वेताल को ढोता हुआ निरुपाय 
तंत्र हूं मैं ।
निष्प्रयोजित लोक के इस भार को यूं लाद कर
और कितनी दूर तक मैं जा सकूंगा-
कह नहीं सकता ।
अनवरत चलते प्रगति के यज्ञ में
दे चुके हो लोक तुम पूर्णाहुति
हड्डियों के एक ढांचे के सिवा
संपदा के नाम पर
कुछ नहीं बाकी तुम्हारे पास ।
लोक अब तुम बोझ हो मुझ तंत्र पर
एक पग भी चल नहीं पाता
तुम्हारे भार को लेकर विकल हूं मुक्ति पाने को
तुम्हारे अस्थिपंजर से  ।
लोक के कंकाल तुमसे प्रार्थना है-
ज़िंदगी  के चंद लमहे और दे दो ।
छोड दो मुझको मेरे ही हाल पर ।
तुम्हारे बोझ से विचलित हुआ जाता  -तुम्हारा मित्र
तंत्र हूं मैं ।
·         


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डॉ. दिनेश चंद्र थपलियाल

I like to write on cultural, social and literary issues.
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